जिले के ढाई हजार आबादी वाले छोटे से गांव संगतपुरा में एक कमरे का घर। तीन एकड़ खेती। मां द्वारा दूध-घी बेचकर जुटाई गई कमाई।
इन्हीं सीमित संसाधनों के बीच नीरू ढांडा ने सुनहरे सपनों को पंख दिए। कभी बुआ को कबड्डी खेलते देख स्वयं मैदान में उतरने वाली नीरू ने मामा के फार्म पर टिन में निशाना लगा जो राह चुनी थी, उस पर चलते हुए एशियाई खेलों में दो दिन के अंदर दो स्वर्ण सहित तीन पदकों पर निशाना साध लिया।
बीपीएल परिवार में जन्मी नीरू ढांडा का नाम आज पूरे देश में गूंज रहा है। वह नेशनल हीरो बन चुकी हैं। मंगलवार को जब नीरू के स्वर्ण पदक जीतने की फोन पर सूचना मिली, उस समय उनकी मां सुदेश डिपो पर राशन लेने जा रही थी।
